Wednesday 23 May 2012

घरों में प्रताड़ित तो सास भी कम नहीं होती आजकल


श्रीगंगानगर-वह जमाना और था जब नाई,पंडित या घर का मुखिया लड़का-लड़की का रिश्ता तय कर देता था। उन रिश्तों की गरमाहट हमेशा रहती। समय बढ़ा...रिश्ते करने का ढंग बदला...खटपट होती...होती रहती...रिश्ते निभते...निभाए जाते...घरों की आन,बान शान के लिए। समय तेजी से आगे चला...बहुओं को प्रताड़ना मिलने लगी...कथित रूप से मारा जाना लगा। कानून बना उनकी सुरक्षा के लिए। अब तो बात ही अलग है। प्रताड़ना बहू को नहीं सास-ससुर को दी जाती है। मज़ाक नहीं सही है। कितने ही परिवार हैं जो बहू की प्रताड़ना का संताप झेल रहें हैं। बहू मनमर्जी करती है। उसकी हर जरूरी गैर जरूरी मांग को पूरा करने की कोशिश की जाती है। शिकायत किसको करे! करें तो घर की इज्जत पर आंच आती है। लोग क्या कहेंगे! भिन्न भिन्न प्रकार की बात होगी। बात एक से अनेक व्यक्तियों तक जाएगी। रिश्तेदारों को पता चलेगा। बस,रिश्तेदारों और समाज के डर से अनेक परिवार बहू की प्रताड़ना को घुट घुट कर सहने को मजबूर हैं। हाय, बहू कुछ कर ना ले....हाय बहू कोर्ट कचहरी ना दिखा दे....हे भगवान पीहर वाले थाने में शिकायत ना कर दें। इस आशंका के कारण सास ससुर भीगी बिल्ली बने बहू की हां में हां मिलाने को बेबस हैं। क्योंकि कुछ अनहोनी हो गई तो गया पूरा परिवार अंदर। कोई सुनवाई नहीं...कोई सफाई नहीं। पैसा गया...इज्जत गई साथ में चला जाता है कारोबार...मन की शांति। कानून,पुलिस तो जैसी है,है। समाज को,सामाजिक संगठनों को तो कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे इस प्रकार के परिवारों को सहारा मिले। बहुओं से प्रताड़ित परिवार अपने मन की आशंकाओं को उनके साथ सांझा कर सुकून प्राप्त करें। ये किसी एक समाज की बात नहीं है। लगभग हर समाज में ऐसे घर हैं जहां एक बहू से पूरा घर प्रताड़ित है। कोई तो हो जो इस प्रकार के परिवारों को घुट घुट कर मरने से बचा सके। जिसकी लड़की जाती है या परेशान रहती है। उनको भी तसल्ली मिले। उनके आंसुओं की भी कद्र हो....उनकी भावनाओं को समझा जाए...उनको न्याय मिले। परंतु यह सब किसी और के साथ नाइंसाफी की कीमत पर ना हो। और यह सब समाज कर सकता है...क्योंकि जैसा समाज होता है वैसे ही हम होते हैं। इस पर जल्दी विचार नहीं हुआ तो समाज में अच्छा बहुत कम होगा। दो लाइन हैं...कोशिश करके देख आरसी पौंछ सके तो आंसू पौंछ,बाँट सके तो दर्द बाँट ले,पीर सदा बेगानी लिख।

Thursday 17 May 2012

गौरव की बात है आईपीएस होना यहां आना हमारा दुर्भाग्य


श्रीगंगानगर-श्रीमानआईपीएस गगनदीप सिंगला जी बिना नमस्कार के ही बात शुरू करनी पड़ेगी....क्योंकि आप अहंकारी हो,अव्यवहारिक हो ....आपने नमस्कार का जवाब देना नहीं इसलिए आपको नमस्कार करके अपना अपमान क्यों करवाऊँ। सिंगला जी आपने आईपीएस बनकर यहाँ की जनता पर कोई अहसान नहीं किया। ना तो जनता ने आपके यहां जाकर आपके परिवार से अनुनय विनय की और ना भगवान से प्रार्थना। यह सौ प्रतिशत आपकी मेहनत,लगन और परिवार की मंगलभावना थी जो आप आईपीएस बने। हमारा दुर्भाग्य जो आप प्रशिक्षण के लिए यहां आए। दुर्भाग्य इसलिए कि जो यहां प्रशिक्षण प्राप्त करता है वह एक दिन एसपी बनकर यहां आता है। अगर आप एसपी बनकर आए और आपका स्वभाव और व्यवहार यही रहा तो आपको तो पता नहीं लेकिन जनता को मुश्किल होगी...बहुत मुश्किल। मैंने तो पढ़ा था....आपने पढ़ा कि नहीं पता नहीं...कि ज्ञानवान,गुणवान,बड़े पद वाले इंसान बहुत विनम्र,शालीन होते हैं...आपके इर्द गिर्द तो यह सब है ही नहीं। आईपीएस होना अलग है और ज्ञानवान,गुणवान,व्यवहार कुशल,संस्कारी होना अलग।आईपीएस तो किताबें रट कर मेहनती युवक बन सकता है। परंतु दूसरे गुणों के लिए अपने अंदर झांकना पड़ता है। दूसरों का दर्द,पीड़ा को समझना होता है। ये सब आप करेंगे ऐसा आपका व्यवहार से लगता नहीं।  आईपीएस बनना खुद के लिए,घर,समाज,राज्य के लिए गौरव की बात है। यह गौरव आप  बढ़िया काम से,विनम्रता से,व्यवहार कुशलता से और अधिक बढ़ा सकते हो। यह सब करने का आपके पास अभी तो समय है। एक बार समय हाथ से निकल गया तो आप आईपीएस तो रहेंगे...नाम और दाम भी होंगे आपके पास...किन्तु जनता के दिलों में आपका कोई स्थान नहीं होगा। जहां जाएंगे वहाँ की जनता आपके तुरंत वापिस जाने की दुआ करेगी। निर्णय आपने करना है....हमारा काम तो लिखना है...मानो ना मानो आपकी मर्जी। आपका स्वभाव ये बताता है कि आपने इस लिखे पर गौर तो क्या करना है...लिखने वाले के प्रति मन में गांठ जरूर बांध लेनी है। अकील नूमामी की लाइन है....सिर्फ ले देके यही एक कमी है हममें,हम हर इक शख़्स को इंसान समझ लेते हैं।

Friday 11 May 2012

ये एसपी तो मस्त है यार



श्रीगंगानगर-जिले का एसपी हंसते हुए मिले तो मुलाकाती के मन को सुकून मिलता है। सुकून की यह सरिता यहां तब तक बहती रहेगी जब तक चालके संतोष कुमार तुकाराम यहां रहेंगे। यस, ऐसे ही हैं संतोष चालके....इस जिले के नए एसपी। सभी से दिल खोलकर...चेहरे पर एवरग्रीन स्माइल के साथ मिलते हैं एसपी। आओ....मिलो....बात करो और जाओ। गप्प बाजी के लिए समय नहीं। वेटिंग रूम खाली रहना चाहिए ताकि अन्य जरूरी काम होते रहें। वे कहते हैं.....सभी से मिलना...व्यवहार कुशलता....ऑफिसर का सम्मान....कोई काम नहीं तब भी मान देना इस जिले के लोगों की विरासत है। इस विरासत का मान रखना मेरा भी कर्तव्य है। इस रिपोर्टर से बात चीत में श्री चालके ने कहा...आम आदमी को 24 घंटे मोबाइल फोन पर उपलब्ध रहूँगा। उसको पुलिस के पास जाने के लिए किसी मिडल मेन को ढूँढने की जरूरत नहीं है। कोई मुझसे मिलने आया और मैं फोन पर बात करूँ...ये नहीं होगा। उनका  कहना था कि पांच छह साल पहले जब मैं यहां रहा जब प्राथमिकता अलग थी। तब से अब तक काफी बदलाव हुए हैं। इस लिए प्राथमिकता बदलती रहती हैं। देखुंगा अब क्या प्राथमिकता हो...उसी के अनुरूप बढ़िया काम करेंगे। बीट सिस्टम को प्रभावी बनाया जाएगा। इसकी बहुत उपयोगिता है इसलिए बीट कांस्टेबल को मोबाइल की सिम फ्री दी जाती है। खुद मुख्यमंत्री ने इसको लागू किया। बेशक कांस्टेबल की बदली हो जाए परंतु बीट कांस्टेबल का मोबाइल नंबर वही रहेगा। किसी और कांस्टेबल को यह सुविधा उपलब्ध नहीं है। बीट कांस्टेबल पहले से अधिक सजगता और कार्यक्षमता से काम करे यह प्रयास किया जाएगा। बातचीत हो रही थी कि संगठन ज्ञापन देने आ गया। कुछ लोगों को एसपी ने बुलाया...जो आए उनमे  महेश पेड़ीवाल भी थे। एसपी उनको देखते ही बोले.. कैसे हो महेश पेड़ीवाल जी।ज्ञापन देने वालों ने धर्मांतरण की बात की। एसपी ने इस विषय पर मुस्कराते हुए जो तर्क दिये उससे मुस्कराते चेहरे के पीछे विचारों की दृढ़ता भी दिखाई दी। उनके तर्कों से सभी निरुतर हो गए। बाहर आकर एक नेता बोला...एसपी मस्त है यार। सच में आज तो एसपी मस्त हैं.....कल इस क्षेत्र की हवा क्या करेगी...इसकी चर्चा मौका मिला तो फिर कभी। सज्जाद मिर्जा कहते हैं...मुझे देखा जो तुमने मुस्करा कर,मैं अपने आप को अच्छा लगा हूँ।

जयपुर के राजनीतिक और सत्ता के गलियारों की खबर


 
श्रीगंगानगर-बीजेपी और कांग्रेस  के नेताओं में वर्चस्व की लड़ाई चल रही है।एक दूसरे को निपटाने के फेर में खुद निपट रहें हैं। वसुंधरा राजे 60-65 विधायकों के इस्तीफे आ जाने से खुश हैं। विरोधी ये सोच कर प्रसन्न हैं कि प्रदेश में सीट  तो दो सौ हैं...मैडम के साथ तो इतने ही हैं। कार्यकर्ताओं का भी जोड़ बाकी किया जा रहा है। लाखों कार्यकर्ताओं में से हजारों ने मैडम का समर्थन किया....बाकी किसके साथ है?जीत अपने आप चल कर मैडम की ओर आ रही थी। मैडम पीछे हो ली। सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस को आज भी सामंतशाही आँख दिखाती है। विश्वेन्द्र सिंह का अभी तो कुछ बिगड़ा नहीं। खुले आम चुनौती दे रहा है....कर लो जिसने जो करना है। अब डॉ चंद्रभान से कौन पूछे की फिर भरतपुर कब जाना है। इन सब घटनाओं के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का चेहरा अधिक खिला खिला रहता है। रहेगा ही...इस लड़ाई से राजनीतिक लाभ तो उन्ही को मिलेगा।
तबादले खुल गए। मंत्रियों के मेला लगा है। विधायकों का...पुलिस और नागरिक प्रशासन के छोटे बड़े अधिकारियों का। विधायक लगभग सभी मंत्रियों के पास डिजायर लेकर नमस्कार करने पहुँच रहें हैं वे साफ कहते हैं विधायक का बेड़ा पार तो मंत्री ही लगाएंगे। मंत्री दूसरे मंत्री को डिजायर भेज रहा है। किसी सीनियर के पास खुद भी जाना पड़ता है। खास डिजायर सीधे सीएम तक पहुंचाई जाती है। हर मंत्री का लगभग पूरा स्टाफ इसी काम में लगा है। क्योंकि अगले साल चुनाव है...इसलिए विधायक,मंत्री सभी कार्यकर्ताओं को राजी रखने की कोशिश में हैं। बड़े बीजेपी के नेता भी चुपके से किसी मंत्री को फोन कर किसी अधिकारी/कर्मचारी को अपने क्षेत्र में लगाने का आग्रह कर देता है। राजनीति में ये चलता है।
बुधवार की शाम मुख्यमंत्री निवास पर आमिर खान और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की संयुक्त प्रेस कान्फ्रेंस थी। आमिर ने शुरुआत की....अशोक जी का धन्यवाद....अशोक जी ने ये किया....अशोक जी ने वो किया। कान्फ्रेंस के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आमिर खान के कंधे पे हाथ रखा और आगे बढ़े...उन्होने आमिर खान से शायद यही कहा होगा...कम से कम मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तो कहते यार...और फिर मुस्कुराहट।

Friday 4 May 2012

पांच करोड़ का कमाल कलेक्टर पहुंचे बी डी की सभा में



श्रीगंगानगर- विकास डब्ल्यू एसपी के सीएमडी  बी डी अग्रवाल द्वारा प्रशासन को नगर के विकास हेतु दिये गए पांच करोड़ रुपए ने धान मंडी के नेताओं को हासिए पर डाल दिया....उनको कागजी नेता बना दिया। पांच करोड़ रुपए का ही कमाल है कि जिला कलेक्टर अंबरीष कुमार खुद धान मंडी पहुंचे। बी डी अग्रवाल की ओर से आयोजित किसानों,व्यापारियों की सभा को संबोधित किया। यह पहला मौका है जब जिला कलेक्टर किसी ऐसे व्यक्ति की सभा में गए जो उद्योगपति होने के साथ साथ जमींदारा पार्टी नामक राजनीतिक दल और एक किसान संगठन के कार्यकारी अध्यक्ष भी हैं। नगर में किसान,मजदूर, आम आदमी से जुड़ी समस्याओं पर छोटी बड़ी सभाएं होती रहती हैं। राजनीतिक भी और गैर राजनीतिक भी। किसी भी जिला कलेक्टर द्वारा कभी इस प्रकार की सभा में जाने की जानकारी नहीं है।  यह बी डी अग्रवाल के पांच करोड़ रुपए ही थे जिन्होने वर्तमान कलेक्टर अंबरीष कुमार को  परंपरा तोड़ सभा में जाने के लिए प्रेरित किया। वरना धान मंडी में बारदाने की समस्या हर बार होती है। व्यापारी,किसान,मजदूर आंदोलन करते हैं। इस बार भी हुआ। सबसे पुरानी व्यापारिक संस्था दी गंगानगर ट्रेडर्स असोसियेशन और कच्चा आढ़तिया संघ के पदाधिकारियों ने किसानों के साथ मंडी ऑफिस में अधिकारी का घेराव किया। दूसरे दिन बी डी अग्रवाल ने मोर्चा संभाला। वे जिला प्रशासन से मिले। प्रशासन के मुखिया जिला कलेक्टर ने बुधवार को मंडी आने का वादा किया। वादा निभाते हुये कलेक्टर ने  बी डी अग्रवाल की सभा में पहुँच कर नई शुरुआत की। बी डी अग्रवाल की बल्ले बल्ले हुई। सालों से मंडी में राजनीति करने वाले व्यापारियों को बी डी अग्रवाल के झंडे के नीचे आना पड़ा। जिला कलेक्टर ने सभा में क्या वादा किया....क्या कहा....बारदाना आएगा या नहीं...यहअलग बात है। बात तो ये कि इससे पहले जिला कलेक्टर कभी इस प्रकार की सभाओं में नहीं जाते थे। कानून व्यवस्था के लिए बहुत जरूरी हुआ तो किसी एडीएम को भेज दिया....वह भी सभा में नहीं...आजू-बाजू। नेताओं से बात की...लौट गए....जैसा चमत्कार बी डी अग्रवाल ने दिखाया ऐसा कभी देखने को नहीं मिला। कहीं पढ़ा था....सब पूछेंगे आप कैसे हैं,जब तक आपके पास पैसे हैं।




Monday 30 April 2012

सरकार जैसी दिखने वाली यह सरकार है भी या नहीं

श्रीगंगानगर-सरकार लाचार है। सरकार अवचेतन अवस्था में है। सरकार दिग्भ्रमित है। सरकार असमंजस में है। सरकार बेकार है। ऐसी सरकार कभी नहीं देखी। और इन सबसे बढ़कर सरकार जैसी दिखने वाली यह सरकार है भी या नहीं या जनता बेकार ही  भ्रम में जी रही है। विपक्ष खिल्ली खिल्ली उड़ाता है। कांग्रेस के मंत्री,सांसद,विधायक नाराज हैं। कार्यकर्ता माथा पीटते हैं। अफसरों में अविश्वास की भावना है। सरकार अच्छा करने के लिए कोई आदेश जारी करती है। बुरा हो जाता है। बुरे को सुधारने के लिए नया फरमान जारी होता है उसका पहले से भी बुरा रिजल्ट आता है। एक को मनाती  है तो अनेक रूठ जाते हैं। सभी को कोई मनाने की ताकत किसी में नहीं है....ईश्वर में भी नहीं। सब के सब किंकर्तव्यविमूढ़ हो इधर उधर देख रहें हैं। शायद कुछ ठीक हो जाए....कुछ ठीक करने के प्रयास में सब कुछ बिगड़ा जा रहा है। इससे पहले ऐसा ना तो देखा ना सुना। 21 अप्रैल को सरकार ने 48 आईपीएस के तबादले किए...इनमें 21 जिलों के एसपी थे। ये ठीक से नया कार्य शुरू भी नहीं कर पाए थे कि 23 आईपीएस की फिर बदली कर दी। पूरे राजस्थान के बात ना भी करें तो श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ के एसपी ने शनिवार को कार्यभार संभाला था। उस दिन अवकाश था। चार्ज लेने के बाद सोमवार को पहला वर्किंग डे था। लेकिन ऑफिस जाने से पहले ही उनको बदल दिया गया। ऐसा अनेक एसपी के साथ हुआ। चार्ज लेने के कुछ घंटे के बाद ही एसपी का तबादला हो जाए तो उसकी रेपुटेशन खराब होती है। यहां तो सरकार ने कइयों को बदल दिया। इस प्रकार का व्यवहार तो कोई छोटे से छोटे कर्मचारी के साथ नहीं करता। आईपीएस तो बहुत बड़ी बात है। अनेक जिलों में एसपी है भी और नहीं भी। जिनके पास चार्ज हैं वे क्या करेंगे....उनका मूड ही नहीं होगा कुछ करने को....क्या पता फिर कोई आदेश....यही स्थिति आने वालों के साथ होगी। जल्दी आने की बजाए इंतजार करेगा....कानून व्यवस्था की ज़िम्मेदारी सरकार की है...जब उसको ही परवाह नहीं तो अधिकारी क्यों करने लगे। इस सरकार को तो संवेदनशील कहना संवेदनशील एसएचबीडी का अपमान ही है।चंद्रभान की लाइन हैं....वक्त ने कितनी बदल डाली है सूरत आपकी,आईने में अपनी तस्वीरें पुरानी देखना। गंभीर बात है इसलिए आज एसएमएस नहीं।

Friday 27 April 2012

गंगा सिंह जी के बाद अंबरीष कुमार जी का नगर भ्रमण


श्रीगंगानगर-बुजुर्गों ने बताया कि महाराजा गंगा सिंह वेश बदल कर प्रजा का दुख सुख जानने के लिए रात को निकला करते थे। कहीं कुछ गलत देखते सुनते तो उसको ठीक करते। कार्य प्रणाली में सुधार होता। पीड़ित को न्याय मिलता। हम परम सौभाग्यशाली है। बड़भागी है। जो महाराजा गंगा सिंह की इस क्षेत्र में अंबरीष कुमार जैसे महा पुरुष हमारे जिला कलेक्टर बन कर अवतरित हुए। गंगा सिंह जी रात को भ्रमण करते थे वेश बदल कर। अब जमाना खराब है। पुलिस का भी कोई यकीन नहीं। रात्रि नगर भ्रमण में खतरा हो सकता है।  इसलिए कलेक्टर जी दिन में भ्रमण करते हैं। पूरे लवाजमे के साथ। ताकि सब देख लें कि कलेक्टर साहब जी को कितनी चिंता है अपनी प्रजा की। कुछ माह के उनके कार्यकाल में वे कई बार नगर दर्शन कर चुके हैं। पहली बार तो हमने भी उनकी इस पहल के लिए शुक्रिया किया था। लगा था कि बहुत कुछ होगा।परंतु घोषणाओं के अतिरिक्त कुछ नहीं हुआ। जब भी नगर भ्रमण तब कोई नई घोषणा। केवल हवाई किले....ये कर दो....ऐसा होना चाहिए.....अफसरों के पास उनकी हां में हां मिलाने  के अलावा कोई रास्ता नहीं। कलेक्टर इस व्यवस्था में जिले का मालिक है कुछ भी कह सकते हैं...मिनी सचिवालय अबोहर रोड पर ले जा सकते हैं....बस अड्डा सूरतगढ़ रोड पर। ओवर ब्रिज बनने ही वाला है....सीवरेज का निर्माण इस दिन शुरू हो जाएगा। रवीन्द्र पथ  पर ट्रैफिक कम करने के लिए बसें ब्लॉक एरिया से आएंगी...जाएंगी..... बरसाती और गंदे पानी की निकासी के लिए पूंजीपतियों से मदद लेंगे। यह तो कुछ भी नहीं महाराज जी ने एक अधिकारी को इसके लिए टेंडर निकालने के आदेश दे दिये। अधिकारी था ठेठ हरियाणवी....उसने इस बारे में नोट शीट बनाकर महाराज जी के सामने रख दी। हस्ताक्षर कौन करे? जुबां हिलाने और नोट शीट पर स्वीकृति देने में बहुत अंतर है। सरकार भी जल्दी से मंजूरी नहीं देती...कलेक्टर जी कैसे देते। बात वहीं के वहीं। दो दिन चले अढ़ाई कोस.... । पता नहीं कलेक्टर जी ऐसा क्यों करते हैं। उनको कोई कुछ करने नहीं देता या उनको नगर भ्रमण कर घोषणाएँ करने का केवल शौक ही है। कलेक्टर जी से यह सब पूछने की हमारी तो हिम्मत नहीं...जिनकी हिम्मत है वे उनकी लल्ला लोरी करते हैं। इसलिए होने दो नगर भ्रमण...करने दो घोषणाएँ....अपना क्या बिगड़ता है...ऐसी तैसी  तो कांग्रेस की हो रही है, होने दो। बशीर फारुकी की लाइन हैं-इन्ही से हमको जबरन मुस्करा के मिलना पड़ता है,हमारे कत्ल की साजिश में जिन के दिन गुजरते हैं।




Sunday 22 April 2012

आज लोग मल्टी क्लर्ड हो गए हैं-एसपी रूपीन्द्र सिंह


श्रीगंगानगर- आईपीएस रूपीन्द्र सिंह कहते हैं कि श्रीगंगानगर की धरती पर दो साल का कार्यकाल लक्की पीरियड रहा। कारण नहीं पता। लोग मल्टी क्लर्ड  हो गए। पोलिटिकल व्यक्ति मुझ से नहीं सिस्टम से नाराज रहे। मुझे इस क्षेत्र में हरियाली,नहरें,पानी,कल्चर,लोगों का मिलने जुलने का स्वभाव बहुत पसंद आए। बहुत काम किया...पास भी हुए फेल भी। एसपी रूपीन्द्र सिंह से तबादले के बाद उनके निवास पर बात चीत हुई। रूपीन्द्र सिंह ने कहा कि यहां मुझे कोई खास परेशानी नहीं हुई। कभी हुई तो वह शॉर्ट आउट हो गई। किसका सहयोग रहा....किसने साथ दिया? रूपीन्द्र सिंह थोड़े दार्शनिक हो गए। कहने लगे...आज लोग मल्टी क्लर्ड हो गए। कहने में कुछ करने में कुछ।मुंह पर दोस्त बनकर आएंगे। असल में दोस्ती निभाएंगे नहीं। उनसे परेशानी हुई....मुझे क्या ऐसे लोगों से सिस्टम को परेशानी है। ये दो चेहरे वाले लोग प्रभावशाली और पहुंचवाले हैं। श्री सिंह के अनुसार उन्हे आमजन का बहुत अधिक सहयोग मिला। वे कहते हैं आम जन के ऐसे काम हुए जिनका कोई रिकॉर्ड किसी थाना या कोर्ट में नहीं है।ऐसे लोगों ने आकर जब काम होने की बात कही तो सुकून मिला। धार्मिक व्यक्ति होने के सवाल पर रूपीन्द्र सिंह ने कहा.. मेरा धर्म से नाता उतना ही है जितना एक व्यक्ति का उसके धर्म से।मुझे समझ नहीं आ रहा मुझे धार्मिक क्यों कहा जाता है। जाति का पक्ष करने संबंधी विवाद के बारे में रूपीन्द्र सिंह बोले कि इसका जवाब तो वहीं देंगे जिन्होने ये विवाद पैदा किया। अपने आप को जज करना मुझे अच्छा नहीं लगता...लोग करे विश्लेषण मेरे बारे।पोलिटिकल लोगों की नाराजगी के संबंध में उनका कहना था कि मुझसे किसी ने नाराजगी व्यक्त नहीं की। वैसे मुझ से कोई नाराज नहीं। नाराजगी थी तो सिस्टम से जिसका मैं हिस्सा हूं। चार कलेक्टर्स के साथ काम किया। बहुत काम करने का मौका मिला। ऐसा कोई समय नहीं आया कि बहुत दुखी या टेंशन में रहा। कभी कोई वक्त आया भी तो निकल गया। फिर सब ठीक हो गया। दो साल में कानून व्यवस्था की वजह से कोई दिक्कत नहीं आई। कोई घटना हुई तो उसका खुलासा भी हुआ।अच्छा भी हुआ तो बुरा भी किन्तु अंत में बैलेंस शीट में रिजल्ट  बढ़िया ही आया। बातचीत के समय घर की बिल्ली आस पास म्याऊँ-म्याऊँ करती रही। रूपीन्द्र सिंह जी बिल्ली को  मिठाई खिलाते हुए बोले...अपने ननिहाल में है ये... मैं पता नहीं इसका मामा लगता हूं या नाना। एसपी रूपीन्द्र सिंह कई दिनों से अवकाश पर हैं। उनके चनक पड़ गई। उनसे मिलने लगातार विभाग के अधिकारी आ रहे थे। शुभकामनाओं का आदान प्रदान हुआ और बात चीत समाप्त। चंद्रभान की लाइन हैवक्त ने कितनी बदल डाली है सूरत आपकी,आईने में अपनी तस्वीर पुरानी देखना।

Wednesday 18 April 2012

सबके अपने अपने दुख: अपने अपने सुख:

श्रीगंगानगर-हम, हम क्या गली का हर बच्चा डॉ गुरदास जी से बहुत डरता था। उनको आते देख बच्चे कंचे खेलना भूल जाते। कंचों की चिंता की बजाए कान खिंचाई की फिक्र अधिक होती। वे कोई डॉन या आज की पुलिस नहीं थे। वे ना तो परिवार के सदस्य थे ना रिश्ते में कुछ लगते थे। डॉ साहब तो गजसिंहपुर में हमारे पड़ौसी थे। उनको किसी भी बच्चे को डांटने का अधिकार था। किसकी मजाल जो घर जाकर डॉ साहब से खाई डांट का जिक्र भी करता...जिक्र किया तो फिर और डांट। 35-40 साल पहले इसी प्रकार का अधिकार सभी पड़ौसियों के पास होता था।

घरों की छतों पर कपड़े सुखाती ,मसालों,अनाज के धूप लगाती हुई औरतें पड़ौसी महिलाओं से बात कर लिया करती थी। नई दुल्हन इसी प्रकार पड़ौस की बहुओं से इसी माध्यम से जान पहचान करती। बात बात में नए रिश्ते बन जाते। किसी यहां जंवाई आता तो गली की कई लड़कियां जीजा-जीजा कहती हुई पहुँच जाती ठिठोली करने। किशोर वय तक हम उम्र लड़के लड़कियां खेलते रहते गली में,एक दूसरे के घर। रिश्तों की सुचिता,प्रेम और भाईचारे की महक से गली मौहल्ला महका करता था। एक का सुख सभी का होकर कई गुणा बढ़ जाता और एक का दुख दर्द बंट कर कम हो जाता।

अपनेपन की वो मिठास,स्नेह और विश्वास अब कहां है। क्या मजाल की आप पड़ौसी के किसी बच्चे को उसकी किसी गलत हरकत पर डांट सको! अब तो अपने बच्चों को डांटने की हिम्मत नहीं होती। अपने बच्चे की गलती पर भी मन मसोस कर रहना पड़ता है पड़ौसी के बच्चे की तरफ तो देखने का रिवाज ही नहीं रहा। घर की बहू अब पड़ौसी की बहू को आते जाते देख सकती है। घर की छत पर उससे मिलना असंभव है। छतों की दीवारें बहुत बड़ी हो गई और हमारी सोच छोटी...हमारे कद से भी छोटी। आज दूसरे की छत की ओर झाँकने में भी शंका आती है...कोई देख ना ले...कोई हुआ तो क्या सोचेगा?जंवाई के आने पर गली की लड़कियों का आना अब नामुमकिन है। गली में लड़के लड़कियों का साथ खेलना......तौबा तौबा...क्या बात करते हो। अब तो बात करते ही बतंगड़ बनते ,बनाते देर नहीं लगती। वातावरण दूषित हो गया किसी को दोष देने का क्या मतलब।

यह कोई किसी एक परिवार,गली,मौहल्ले या शहर की बात नहीं है। सभी स्थानों पर सभी के साथ ऐसा ही होता है। पता नहीं हवा में कुछ ऐसा घुल गया या खान पान का असर है। या फिर प्रकृति की कोई नई लीला। कहते हैं अब गन्ने में पहले जैसी मिठास नहीं रही और ना सब्जियों में वो ताजगी भरा,तृप्त कर देने वाला स्वाद।लेकिन क्या हमारे आपसी रिश्तों में हैं ये सब....जब रिश्तों में नहीं तो हम फिर इनमें क्यों खोजते हैं।

प्यार की बात

तुझसे प्यार की बात बहुत मुश्किल है
वक्त तो तुझे देखने में ही गुजर जाता है।

Wednesday 11 April 2012

टूट गए हैं रिश्ते

टूट गए हैं रिश्ते
किस्से खतम हुए
तुम क्या जानो बात
कितने जतन हुए।
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गली मोहल्ले प्यारे प्यारे
पूछ रहें हैं मिल के सारे
रहते थे जो साथ
वो क्यों बिछड़ गए।

संधू एंड कंपनी और गौड़ अब राजनीति में साथ साथ

श्रीगंगानगर-राजनीति में किसी से किसी भी प्रकार का संबंध कभी स्थाई नहीं हो सकता। यहां नए रिश्ते बनते भी देर नहीं लगती और पुराने बिगड़ते भी। एक से अनेक हो जाते हैं और अनेक से एक। कोई अधिक समय नहीं हुआ जपृथ्वीपाल सिंह संधू एंड कंपनी के रिश्ते सेठ से बहुत प्रगाढ़ थे। पारिवारिक कहे जाते थे। दिल्ली जयपुर के राजनीतिक गलियारों में एक साथ जाना। राजनीति में गोटी फिट हो गई। किस्मत ने साथ दिया। सेठ न्यास के अध्यक्ष बन गए। संधू एंड कंपनी की बल्ले बल्ले हो गई। पर ये समय है...एक समान कहां,कब रहता है। पलट गया समय... अध्यक्ष बने सेठ ने संधू के बंदों के अहम पर चोट की...मतलब इनके तालाब की मछली इनको ही आँख दिखाने लगी। सेठ और संधू एंड कंपनी का याराना टूट गया। रिश्ते बिगड़ गए। संबंध समाप्त। रास्ते अलग अलग। इसके बावजूद संधू एंड कंपनी के दिलो दिमाग पर सेठ के साथ रिश्ते की मिठास और उसका रस आज भी है। लेकिन ये राजनीति हैं...यहां स्वार्थ,अहम जब टकराते हैं तो फिर रसगुल्ले जैसी मिठास और रस वाले रिश्तों की परवाह नहीं की जाती। नए रिश्ते तलाश किए जाते हैं। यह तलाश राजकुमार गौड़ पर जाकर समाप्त हो गई। इसमें कोई पर्दा नहीं है कि संधू एंड कंपनी ने विधानसभा चुनाव में गौड़ साहब की कितनी और किस प्रकार मदद की थे। परंतु यही तो राजनीति है...दोनों को एक दूसरे की आज जरूरत है। गौड़ साहब को थोड़ी आशंका है कि सेठ उनका प्रतिद्वंद्वी ना बन जाए। इसलिए उसको कमजोर रखना जरूरी है....संधू एंड कंपनी उसको आँख दिखाने का परिणाम दिखाना चाहती हैं। दोनों की मंजिल एक थी इसलिए ये दोनों नजदीक आ गए।श्री गौड़ का श्रीगंगानगर विधानसभा क्षेत्र में अपना महत्व है। मुख्यमंत्री से उनके रिश्ते भी बढ़िया है। संधू एंड कंपनी की दिल्ली जयपुर में अच्छी लाइजनिंग है। अब गौड़ और संधू गुट फिलहाल एक है। यह एकता केवल सेठ जी को निपटाने तक ही है या दूर तक दिखाई देगी ये कहना मुश्किल है। क्योंकि यह ऊपर लिखा जा चुका है कि राजनीति में रिश्ते बनते बिगड़ते रहते हैं। वैसे श्रीगंगानगर में ये दोनों गुट ही अधिक प्रभावी हैं। किन्तु फिलहाल दोनों को एक दूसरे की जरूरत है। चाहे दिखावे के लिए ही सही।

Monday 19 March 2012

जो सरक सरक के काम करे वह सरकार

श्रीगंगानगर- जब से कुछ जानने लगा हूं तभी से यही मानता रहा कि सरकार वह जो सरक सरक के काम करे। लेकिन कोई केंद्र सरकार इतनी भी सरक सकती है ये नहीं सोचा था। इसे सरकना कहा तो क्या कहा....यह तो रेंगना हुआ....साफ साफ रेंगना। कई दिन से नाटक खेला जा रहा है हिंदुस्तान की छाती पर....देश की आन,बान,शान को मिट्टी में मिलाने का। इसके पात्र हैं सभी राजनीतिक दल। कोई आदमी तो मजबूर हो सकता है। कोई सरकार भी इतनी मजबूर होगी ये तो कल्पना से परे है। देश की चिंता नहीं। जनता के दुख दर्द से कोई लेना देना नहीं। सब के सब लगे हैं अपनी खुंदक निकालने में। अपने अहंकार को और अधिक पुष्पित,पल्लवित करने में। एक दूसरे को नीचा दिखाने में। अपनी अपनी नाक को ऊंचा रखना है। देश की नाक कटे तो कटे। लगता ही नहीं कि कोई सरकार चला रहें हैं। ये तो धक्केशाही है इस देश के आमजन के साथ। जिस प्रकार ये देश चला रहें हैं इस प्रकार से तो कोई घर नहीं चलता। देश को संभालने की बात तो बहुत दूर की है। ये क्या सरकार....ये कैसा प्रधानमंत्री....जिसका जी किया आँख दिखा दी....जिस किसी कि इच्छा हुई उसने टेंटुआ दबा दिया। ऐसी क्या मजबूरी...अपने जमीर को तो आपने मैडम के कदमों में डाल दिया। देश की प्रतिष्ठा का तो कोई ख्याल करो। इसकी इस प्रकार तो मिट्टी ना करो। कुछ तो मर्दानगी दिखाओ। ममता...मुलायम ताबे नहीं आ रहे तो आ जाओ चुनाव मैदान में। रोज रोज का नाटक तो समाप्त हो। देश का रेल मंत्री...या कोई भी मंत्री कौन होगा....त्रिवेदी...हो या चतुर्वेदी...मुकुल हो या नुकुल....इससे से जनता का कोई मतलब नहीं होता। जनता से पूछ कर कोई किसी को बनाता या हटाता भी नहीं है। परंतु किसी को हटाने...बनाने का ये क्या तरीका हुआ। इस प्रकार तो बच्चों की गली वाली क्रिकेट टीम में भी नहीं होता। पूरा संसार नेताओं का यह नाटक देख रहा है। मामूली सी समझ रखने वाला भी कह देगा कि यह गलत हो रहा है। किन्तु अफसोस इनको खुद को यह महसूस नहीं हो रहा। ओह! इनको महसूस हो भी कैसे....इनके दो वो दिल ही नहीं जो जनता की भावनाओं को समझ सकें। ऐसा होता तो ये नाटक होता ही नहीं। चलो ये पढ़ोमनमोहन जी टिके हुए हैं बिना किए कुछ काम,उनकी जुबां पर रहता है बस इक मैडम का नाम, भज ले नारायण का नाम, भज ले नारायण का नाम

Friday 2 March 2012

बीजेपी में होने लगी राधेश्याम गंगानगर की नाकाबंदी

श्रीगंगानगर-राजनीति में कई बार कुछ कहे बिना ही बहुत कुछ सुनाई,दिखाई देने लगता है। कोई बयान नहीं है। कोई पोस्टर होर्डिंग भी नहीं लगे। फिर भी ऐसा राजनीतिक गलियारों में ये अहसास होने लगा है कि बीजेपी विधायक राधेश्याम गंगानगर की पार्टी में नाका बंदी शुरू हो गई है। यस! क्षेत्र के सबसे परिपक्व राजनेता की नाका बंदी। पार्टी का कोई भी ग्रुप ऐसा नहीं है जो इस काम में अपना योगदान ना दे रहा हो। सभी का एक सूत्री कार्यक्रम कि बीजेपी की टिकट को राधेश्याम की झोली में जाने से रोका जाए। लेकिन सबसे अधिक मुश्किल फिलहाल विकल्प की है। कोई ऐसा नेता नहीं दिख रहा जो बीजेपी की टिकट लेकर चुनाव जीत सके। बी डी अग्रवाल के रूप में एक आशा की किरण पार्टी के ऐसे नेताओ को नजर आई थी। लेकिन उन्होने अपनी पार्टी का ऐलान कर दिया। वैसे तलाश अभी समाप्त कहां हुई है। इनके पास हर बिरादरी के बंदे हैं जो राधेश्याम के मुक़ाबले टिकट के लिए आगे तो किए ही जा सकते हैं। नाम हम लिखते हैं। किसमे कितना दम है,आइडिया आप लगा लेना। तो जनाब नाका बंदी की कोशिश में लगे नेताओं के पास अरोड़ा बिरादरी के सोनू नागपाल,ओबीसी के प्रहलाद राय टाक,राजपूत समाज के गजेन्द्र सिंह भाटी,वैश्य समाज पेड़ीवाल [पार्टी में शामिल होने में कितना समय लगता है] हैं हीं। और नहीं तो प्रदेश में नेताओं का अकाल तो नहीं है। भैरों सिंह शेखावत की तरह बाहर से किसी बड़े लीडर को भी बुलाया जा सकता है। नाका बंदी में जुटे बीजेपी लीडरों को इस बात से कोई लेना देना नहीं कि राधेश्याम के अलावा कोई और जीत सकता है या नहीं। बस उनको तो राधेश्याम गंगानगर की कढ़ी खराब करनी है। चलो मान लो। राधेश्याम की टिकट कटवा दी। किन्तु उनको चुनाव लड़ने से कौन रोक सकता है। आज के दिन जो राधेश्याम गंगानगर के बिना कोई भी राजनीतिक टीकाकार विधानसभा चुनाव की का कल्पना नहीं कर सकता। बेशक नेहरू पार्क में किसान महा पंचायत में राधेश्याम गंगानगर का कोई पोस्टर,होर्डिंग नहीं था। उनके बंदों को भी खास अहमियत नहीं मिली। लेकिन इसका यह राजनीतिक अर्थ नहीं कि राधेश्याम गंगानगर गुजरे जमाने की बात हो गए।

Tuesday 28 February 2012

कुछ तो बोल दे

लब तू खोल दे
कुछ तो बोल दे,
मन की सारी
गाँठे प्यारी
एक दिन
मुझ संग खोल दे।

Tuesday 21 February 2012

प्रभारी मंत्री ने की बस जनसुनवाई

श्रीगंगानगर-राजस्थान सरकार के जन सुनवाई कार्यक्रम के तहत प्रभारी मंत्री विनोद कुमार ने कलेक्ट्रेट में जन सुनवाई की। पहली अर्जी सिंचाई विभाग के बारे में थी। मगर विभाग के एससी नहीं थे। उनके स्थान पर जो अधिकारी आया उससे पूछा गया तो वह कहने लगा कि एससी ही कर सकते हैं। उसके बाद एससी को बुलाया गया। बिजली वालों के लिए तो खुद कलेक्टर अंबरीष कुमार ने मेज बजा कर आवाज लगाई। लेकिन कोई होता तो आता। ऐसे ही शिक्षा विभाग के अधिकारी की आवाज लगती रही। सुनवाई के समय मदद करने के लिए बड़ी संख्या में कांग्रेस के नेता सभाकक्ष में थे। बड़ी संख्या में लोग अपनी शिकायत लेकर पहुंचे। मंत्री ने अर्जी ली,उसकी बात सुनी,अधिकारी से पूछा और अर्जी उसके हवाले कर दी। या तो मंत्री ने खुद कह दिया कि अधिकारी से मिल लेना या खुद अधिकारी बोल पड़ा,मुझसे आकर मिल लेना। जो भी लोग आए उनके काम लंबे समय से अटके हैं। किन्तु उनको आज भी यह बताने वाला कोई नहीं था कि उनका काम कब होगा। मंत्री के साथ कलेक्टर,एसपी, विधायक राधेश्याम गंगानगर,संतोष सहारण,कांग्रेस नेता राजकुमार गौड़,कुलदीप इंदौरा,पृथ्वी पाल सिंह सहित अन्य नेता पदाधिकारी भी थे। अधिकांश तो बस उपस्थिति लगाने के लिए ही थे। जिनकी सुनवाई करनी थी वे बाहर थे अपनी बारी के इंतजार में।

अव्यवस्था रही मंत्री की सुनवाई में

श्रीगंगानगर-प्रभारी मंत्री की जन सुनवाई के समय शुरू में तो काफी अव्यवस्था का माहौल रहा। शोर इतना अधिक था कि कौन क्या कह रहा है सुना ही नहीं जा रहा था। बड़ी संख्या में लोग एक साथ अंदर आ गए। पत्रकार भी बहुत अधिक थे। एसपी ने कलेक्टर के इशारे पर पत्रकारों से पूछा भी। एसपी ने पत्रकारों को बाहर ले जाने के प्रयास भी किए। लेकिन पार नहीं पड़ी। कुछ समय बाद बार बारी से एक एक करके बुलाने का सिलसिला शुरू हुआ तब कहीं जाकर कोई व्यवस्था बनी। जो जनप्रतिनिधि देरी से आए उनको उनके अनुकूल स्थान पर बैठने के लिए कई बार कुर्सी खिसकानी पड़ी। जिला प्रमुख के आने पर तो कलेक्टर,एसपी को भी कुर्सी छोडकर उनके लिए कुर्सी लगवानी पड़ी।

शंकर पन्नू पहुंचे किसानों के साथ प्रभारी मंत्री के दरबार में

श्रीगंगानगर- कांग्रेस के इस शासन किसानों की सुनवाई नहीं हो रही। अगर किसानों की सुनवाई होती तो कांग्रेस नेता पूर्व सांसद शंकर पन्नू को खुद गन्ना उत्पादकों का प्रतिनिधिमंडल लेकर सुनवाई के लिए प्रभारी मंत्री के दरबार में नहीं आना पड़ता। वे अन्य कांग्रेस नेताओं की तरह अंदर नहीं बैठे थे। शंकर पन्नू गन्ना उत्पादकों के साथ कलेक्ट्रेट पहुंचे। वे बिना के किसानों के साथ अंदर गए। मंत्री से बात की। उनसे बाहर आकर किसानों से मिलने को कहा। प्रभारी मंत्री सुनवाई बीच में छोडकर बाहर आकर गन्ना उत्पादकों से मिले। गन्ना उत्पादकों ने शुगर मिल की हालत से मंत्री को अवगत करवाया। उनका कहना था कि मिल की हालत खराब है। गन्ना लिया नहीं जा रहा। चूंकि किसान अधिकतर श्रीकरनपुर क्षेत्र के थे इसलिए पृथ्वीपाल संधु भी उनके साथ हो लिए।

काली पट्टी लगा पत्रकार मिले प्रभारी मंत्री से

श्रीगंगानगर-नगर के कुछ पत्रकारों ने काली पट्टी लगाकर प्रभारी मंत्री से बात की। उनका कहना था कि नगर विकास न्यास उनको रियायती दर पर भूखंड नहीं दे रहा जबकि सरकार के आदेश हैं। न्यास अध्यक्ष ज्योति कांडा ने कहा कि वे रिजर्व प्राइज़ पर भूखंड देने को तैयार हैं। इस मसले पर कई पत्रकारों की कांडा जी से बोल चाल भी हुई। कांग्रेस नेताओं ने बीच बचाव किया। न्यास के पूर्व अध्यक्ष राजकुमार गौड़ ने प्रभारी मंत्री को बताया कि इसके लिए पीआरओ की चेयरमेनशिप में कमेटी बनाकर निर्णय लिया जाए। कांडा जी ने भूखंड से वंचित पत्रकारों को बात चीत के लिए बुलाया है।

Sunday 19 February 2012

तंत्र,टोटके,अश्लील वाक्यों की पुस्तक को कलेक्टर ने बताया लाभप्रद

श्रीगंगानगर-टोटकों,तंत्र विद्या का बेशक बहुत महत्व होता होगा। भूत प्रेत के बारे में भी सभी की अपनी अपनी मान्यता होगी। अश्लीलता भी पर्दे में गरिमामय होती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जिला कलेक्टर जाने अनजाने इस प्रकार की बात को बढ़ावा दें और ऐसी बातों को समाज के लिए लाभप्रद बताएं। क्षेत्र में सोने,चांदी,डायमंड के जाने माने व्यवसायी,अनेकानेक सामाजिक धार्मिक संस्थाओं से जुड़े हुए शामलाल जैन ने अरोग्यता का रहस्य नामक पुस्तक का लेखन व संकलन किया। कहने को तो इसमें आयुर्वेद से बीमारियों का इलाज की जानकारी है। परंतु इस पुस्तक में टोटकों के रूप में ऐसे ऐसे अश्लील वाक्य हैं कि उनको यहां लिखना भी संभव नहीं।ये टोटके आयुर्वेद से संबन्धित नहीं हो सकते। विज्ञान के इस युग में जब भूत,प्रेत जैसे अंधविश्वासों को दूर करने के प्रयास होते हैं, स्कूल से लेकर कॉलेज तक की शिक्षा में। ऐसे दौर में पुस्तक यह बताती है कि भूत प्रेत की बाधा कैसे बचा जा सकता है। तंत्र की जानकारी भी इस पुस्तक के कई पृष्ठों पर हैं। इस प्रकार की पुस्तक मेलों,बस अड्डे और रेलवे स्टेशन की स्टाल पर बिका करती हैं। किसी गर्ल्स कॉलेज के उत्सव में उसका विमोचन करवा खुले में वितरित करना उचित नहीं कहा जा सकता। मगर शाम लाल जी को कौन रोकता! वे कॉलेज के कोषाध्यक्ष जो हैं। इसलिए ऐसा हुआ। इसी पुस्तक के बारे में जिला कलेक्टर अंबरीष कुमार का संदेश भी है। जिसमें उन्होने कहा है कि यह पुस्तक समाज के लिए लाभप्रद सिद्ध होगी। पाठकों को इस पुस्तक के माध्यम से अपने जीवन में आने वाली परेशानियों से छुटकारा मिलेगा। समाज खुशहाल एवं निरोगी जीवन व्यतीत कर सकेगा.........आदि आदि। शायद जिला कलेक्टर ने पुस्तक की पाण्डुलिपि पढे बिना ही संदेश दे दिया। अगर वे पढ़ते तो उन वाक्यों को जरूर हटवाते जो अश्लील हैं। तंत्र और टोटकों को बढ़ावा देने वाले हैं। अन्यथा संभव है संदेश देने से मना कर देते। इसी प्रकार के संदेश नगर परिषद आयुक्त हितेश कुमार और नगर परिषद सभापति जगदीश जांदू के भी हैं। शामलाल जैन का इतना नाम तो है ही कि कोई उनको संदेश के लिए कोई नाराज क्यों करने लगा। शामलाल जैन का उद्देश्य भी कोई गलत नहीं हो सकता। वे गर्व से कहते हैं कि जो कुछ लिखा है एकदम सही है....मैं दिखा सकता हूं कौनसी किताब से लिया। सही तो होगा....लेकिन उनके जैसे व्यक्ति के लिए ऐसे वाक्यों सार्वजनिक रूप से बांटी जाने वाली पुस्तक में लिखना ठीक है क्या?

Thursday 2 February 2012

शंकर पन्नू ने करवाई कांडा की मुर्दाबाद,हाय-हाय


श्रीगंगानगर-पूर्व सांसद शंकर पन्नू के सच्चे शब्दों ने नगर विकास न्यास अध्यक्ष ज्योति कांडा की मुर्दाबाद...हाय-हाय करवा दी। समारोह का जायका बिगाड़ दिया। गले में पड़े फूलों माला चुभने लगी। करनी मार्ग पर रेल फाटक उदघाटन समारोह था। छोटा सा शामियाना लगाया गया। हीरा लाल इंदौरा,शंकर पन्नू जैसे बड़े कांग्रेस नेता बुलाए गए। पूरी यूआईटी थी। साइड में वे परिवार भी खड़े थे जिनके मकान तोड़े थे। शंकर पन्नू ने बोलना शुरू किया। वे उनको देख कर बोले...कब्जा किया जब पूछा था क्या...तब अंदर कर देते तो.... इसके बाद पन्नू जी ने क्या बोलना था। वे परिवार शोर मचाने लगे जो मकानों की उम्मीद लगाए थे। शोर मचाते हुए मंच के करीब आ गए। पुलिस ने उनको दूर किया। वे जयोति कांडा मुर्दाबाद...हाय हाय करने लगे। हीरा लाल इंदौरा ने मंच से समझाया। ज्योति कांडा ने भाषण दिया। किसने सुनना था। मुर्दाबाद हाय हाय होती रही। कुछ क्षण बाद यूआईटी चली गई। नेता भी रवाना हो लिए। मकान मांगने वालों ने वहाँ लगे होर्डिंग को निशाना बनाया। पहले दोनों होर्डिंग पर ज्योति कांडा की फोटो पर गीली मिट्टी फेंकी। फिर फोटो पर पत्थर मार कर छेद किए। मन नहीं भरा तो होर्डिंग उखाड़ डाले। उनकी चिंदी चिंदी कर जिसके हाथ में जो आया वह उसे लेकर चलता बना। कोई बांस ले गया। किसी के हाथ लोहा आया। कोई फ़्लेक्स समेत कर चलता बना।जितना समय होर्डिंग को बनाने में लगा होगा उससे कम समय में उसको तार-तार करने में लगा। सभी खुश। शंकर पन्नू भी और कांडा जी भी। शंकर पन्नू की बात तो सच्ची थी किन्तु मौका और स्थान सही नहीं था। केवल उदघाटन होता तो मीडिया में उतना प्रचार नहीं होता। जितना अब होगा। इसीलिए तो कहते हैं कि कड़वा सच पत्थर के समान होता है,मगर वह नुकसान पत्थर की चोट से भी अधिक करता है।