नारदमुनि जी
आम हो या ख़ास, आपकी बात, आपके पास
Wednesday 23 May 2012
घरों में प्रताड़ित तो सास भी कम नहीं होती आजकल
Thursday 17 May 2012
गौरव की बात है आईपीएस होना यहां आना हमारा दुर्भाग्य
Friday 11 May 2012
ये एसपी तो मस्त है यार
जयपुर के राजनीतिक और सत्ता के गलियारों की खबर
Friday 4 May 2012
पांच करोड़ का कमाल कलेक्टर पहुंचे बी डी की सभा में
Monday 30 April 2012
सरकार जैसी दिखने वाली यह सरकार है भी या नहीं
Friday 27 April 2012
गंगा सिंह जी के बाद अंबरीष कुमार जी का नगर भ्रमण
Sunday 22 April 2012
आज लोग मल्टी क्लर्ड हो गए हैं-एसपी रूपीन्द्र सिंह
Wednesday 18 April 2012
सबके अपने अपने दुख: अपने अपने सुख:
श्रीगंगानगर-हम, हम क्या गली का हर बच्चा डॉ गुरदास जी से बहुत डरता था। उनको आते देख बच्चे कंचे खेलना भूल जाते। कंचों की चिंता की बजाए कान खिंचाई की फिक्र अधिक होती। वे कोई डॉन या आज की पुलिस नहीं थे। वे ना तो परिवार के सदस्य थे ना रिश्ते में कुछ लगते थे। डॉ साहब तो गजसिंहपुर में हमारे पड़ौसी थे। उनको किसी भी बच्चे को डांटने का अधिकार था। किसकी मजाल जो घर जाकर डॉ साहब से खाई डांट का जिक्र भी करता...जिक्र किया तो फिर और डांट। 35-40 साल पहले इसी प्रकार का अधिकार सभी पड़ौसियों के पास होता था।
घरों की छतों पर कपड़े सुखाती ,मसालों,अनाज के धूप लगाती हुई औरतें पड़ौसी महिलाओं से बात कर लिया करती थी। नई दुल्हन इसी प्रकार पड़ौस की बहुओं से इसी माध्यम से जान पहचान करती। बात बात में नए रिश्ते बन जाते। किसी यहां जंवाई आता तो गली की कई लड़कियां जीजा-जीजा कहती हुई पहुँच जाती ठिठोली करने। किशोर वय तक हम उम्र लड़के लड़कियां खेलते रहते गली में,एक दूसरे के घर। रिश्तों की सुचिता,प्रेम और भाईचारे की महक से गली मौहल्ला महका करता था। एक का सुख सभी का होकर कई गुणा बढ़ जाता और एक का दुख दर्द बंट कर कम हो जाता।
अपनेपन की वो मिठास,स्नेह और विश्वास अब कहां है। क्या मजाल की आप पड़ौसी के किसी बच्चे को उसकी किसी गलत हरकत पर डांट सको! अब तो अपने बच्चों को डांटने की हिम्मत नहीं होती। अपने बच्चे की गलती पर भी मन मसोस कर रहना पड़ता है पड़ौसी के बच्चे की तरफ तो देखने का रिवाज ही नहीं रहा। घर की बहू अब पड़ौसी की बहू को आते जाते देख सकती है। घर की छत पर उससे मिलना असंभव है। छतों की दीवारें बहुत बड़ी हो गई और हमारी सोच छोटी...हमारे कद से भी छोटी। आज दूसरे की छत की ओर झाँकने में भी शंका आती है...कोई देख ना ले...कोई हुआ तो क्या सोचेगा?जंवाई के आने पर गली की लड़कियों का आना अब नामुमकिन है। गली में लड़के लड़कियों का साथ खेलना......तौबा तौबा...क्या बात करते हो। अब तो बात करते ही बतंगड़ बनते ,बनाते देर नहीं लगती। वातावरण दूषित हो गया किसी को दोष देने का क्या मतलब।
यह कोई किसी एक परिवार,गली,मौहल्ले या शहर की बात नहीं है। सभी स्थानों पर सभी के साथ ऐसा ही होता है। पता नहीं हवा में कुछ ऐसा घुल गया या खान पान का असर है। या फिर प्रकृति की कोई नई लीला। कहते हैं अब गन्ने में पहले जैसी मिठास नहीं रही और ना सब्जियों में वो ताजगी भरा,तृप्त कर देने वाला स्वाद।लेकिन क्या हमारे आपसी रिश्तों में हैं ये सब....जब रिश्तों में नहीं तो हम फिर इनमें क्यों खोजते हैं।
Wednesday 11 April 2012
टूट गए हैं रिश्ते
टूट गए हैं रिश्ते
किस्से खतम हुए
तुम क्या जानो बात
कितने जतन हुए।
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गली मोहल्ले प्यारे प्यारे
पूछ रहें हैं मिल के सारे
रहते थे जो साथ
वो क्यों बिछड़ गए।
संधू एंड कंपनी और गौड़ अब राजनीति में साथ साथ
श्रीगंगानगर-राजनीति में किसी से किसी भी प्रकार का संबंध कभी स्थाई नहीं हो सकता। यहां नए रिश्ते बनते भी देर नहीं लगती और पुराने बिगड़ते भी। एक से अनेक हो जाते हैं और अनेक से एक। कोई अधिक समय नहीं हुआ जब पृथ्वीपाल सिंह संधू एंड कंपनी के रिश्ते “सेठ” से बहुत प्रगाढ़ थे। पारिवारिक कहे जाते थे। दिल्ली जयपुर के राजनीतिक गलियारों में एक साथ जाना। राजनीति में गोटी फिट हो गई। किस्मत ने साथ दिया। सेठ न्यास के अध्यक्ष बन गए। संधू एंड कंपनी की बल्ले बल्ले हो गई। पर ये समय है...एक समान कहां,कब रहता है। पलट गया समय... अध्यक्ष बने सेठ ने संधू के बंदों के अहम पर चोट की...मतलब इनके तालाब की मछली इनको ही आँख दिखाने लगी। सेठ और संधू एंड कंपनी का याराना टूट गया। रिश्ते बिगड़ गए। संबंध समाप्त। रास्ते अलग अलग। इसके बावजूद संधू एंड कंपनी के दिलो दिमाग पर सेठ के साथ रिश्ते की मिठास और उसका रस आज भी है। लेकिन ये राजनीति हैं...यहां स्वार्थ,अहम जब टकराते हैं तो फिर रसगुल्ले जैसी मिठास और रस वाले रिश्तों की परवाह नहीं की जाती। नए रिश्ते तलाश किए जाते हैं। यह तलाश राजकुमार गौड़ पर जाकर समाप्त हो गई। इसमें कोई पर्दा नहीं है कि संधू एंड कंपनी ने विधानसभा चुनाव में गौड़ साहब की कितनी और किस प्रकार मदद की थे। परंतु यही तो राजनीति है...दोनों को एक दूसरे की आज जरूरत है। गौड़ साहब को थोड़ी आशंका है कि सेठ उनका प्रतिद्वंद्वी ना बन जाए। इसलिए उसको कमजोर रखना जरूरी है....संधू एंड कंपनी उसको आँख दिखाने का परिणाम दिखाना चाहती हैं। दोनों की मंजिल एक थी इसलिए ये दोनों नजदीक आ गए।श्री गौड़ का श्रीगंगानगर विधानसभा क्षेत्र में अपना महत्व है। मुख्यमंत्री से उनके रिश्ते भी बढ़िया है। संधू एंड कंपनी की दिल्ली जयपुर में अच्छी लाइजनिंग है। अब गौड़ और संधू गुट फिलहाल एक है। यह एकता केवल सेठ जी को निपटाने तक ही है या दूर तक दिखाई देगी ये कहना मुश्किल है। क्योंकि यह ऊपर लिखा जा चुका है कि राजनीति में रिश्ते बनते बिगड़ते रहते हैं। वैसे श्रीगंगानगर में ये दोनों गुट ही अधिक प्रभावी हैं। किन्तु फिलहाल दोनों को एक दूसरे की जरूरत है। चाहे दिखावे के लिए ही सही।
Monday 19 March 2012
जो सरक सरक के काम करे वह सरकार
श्रीगंगानगर- जब से कुछ जानने लगा हूं तभी से यही मानता रहा कि सरकार वह जो सरक सरक के काम करे। लेकिन कोई केंद्र सरकार इतनी भी सरक सकती है ये नहीं सोचा था। इसे सरकना कहा तो क्या कहा....यह तो रेंगना हुआ....साफ साफ रेंगना। कई दिन से नाटक खेला जा रहा है हिंदुस्तान की छाती पर....देश की आन,बान,शान को मिट्टी में मिलाने का। इसके पात्र हैं सभी राजनीतिक दल। कोई आदमी तो मजबूर हो सकता है। कोई सरकार भी इतनी मजबूर होगी ये तो कल्पना से परे है। देश की चिंता नहीं। जनता के दुख दर्द से कोई लेना देना नहीं। सब के सब लगे हैं अपनी खुंदक निकालने में। अपने अहंकार को और अधिक पुष्पित,पल्लवित करने में। एक दूसरे को नीचा दिखाने में। अपनी अपनी नाक को ऊंचा रखना है। देश की नाक कटे तो कटे। लगता ही नहीं कि कोई सरकार चला रहें हैं। ये तो धक्केशाही है इस देश के आमजन के साथ। जिस प्रकार ये देश चला रहें हैं इस प्रकार से तो कोई घर नहीं चलता। देश को संभालने की बात तो बहुत दूर की है। ये क्या सरकार....ये कैसा प्रधानमंत्री....जिसका जी किया आँख दिखा दी....जिस किसी कि इच्छा हुई उसने टेंटुआ दबा दिया। ऐसी क्या मजबूरी...अपने जमीर को तो आपने मैडम के कदमों में डाल दिया। देश की प्रतिष्ठा का तो कोई ख्याल करो। इसकी इस प्रकार तो मिट्टी ना करो। कुछ तो मर्दानगी दिखाओ। ममता...मुलायम ताबे नहीं आ रहे तो आ जाओ चुनाव मैदान में। रोज रोज का नाटक तो समाप्त हो। देश का रेल मंत्री...या कोई भी मंत्री कौन होगा....त्रिवेदी...हो या चतुर्वेदी...मुकुल हो या नुकुल....इससे से जनता का कोई मतलब नहीं होता। जनता से पूछ कर कोई किसी को बनाता या हटाता भी नहीं है। परंतु किसी को हटाने...बनाने का ये क्या तरीका हुआ। इस प्रकार तो बच्चों की गली वाली क्रिकेट टीम में भी नहीं होता। पूरा संसार नेताओं का यह नाटक देख रहा है। मामूली सी समझ रखने वाला भी कह देगा कि यह गलत हो रहा है। किन्तु अफसोस इनको खुद को यह महसूस नहीं हो रहा। ओह! इनको महसूस हो भी कैसे....इनके दो वो दिल ही नहीं जो जनता की भावनाओं को समझ सकें। ऐसा होता तो ये नाटक होता ही नहीं। चलो ये पढ़ो—मनमोहन जी टिके हुए हैं बिना किए कुछ काम,उनकी जुबां पर रहता है बस इक मैडम का नाम, भज ले नारायण का नाम, भज ले नारायण का नाम
Friday 2 March 2012
बीजेपी में होने लगी राधेश्याम गंगानगर की नाकाबंदी
Tuesday 28 February 2012
Tuesday 21 February 2012
प्रभारी मंत्री ने की बस जनसुनवाई
श्रीगंगानगर-राजस्थान सरकार के जन सुनवाई कार्यक्रम के तहत प्रभारी मंत्री विनोद कुमार ने कलेक्ट्रेट में जन सुनवाई की। पहली अर्जी सिंचाई विभाग के बारे में थी। मगर विभाग के एससी नहीं थे। उनके स्थान पर जो अधिकारी आया उससे पूछा गया तो वह कहने लगा कि एससी ही कर सकते हैं। उसके बाद एससी को बुलाया गया। बिजली वालों के लिए तो खुद कलेक्टर अंबरीष कुमार ने मेज बजा कर आवाज लगाई। लेकिन कोई होता तो आता। ऐसे ही शिक्षा विभाग के अधिकारी की आवाज लगती रही। सुनवाई के समय मदद करने के लिए बड़ी संख्या में कांग्रेस के नेता सभाकक्ष में थे। बड़ी संख्या में लोग अपनी शिकायत लेकर पहुंचे। मंत्री ने अर्जी ली,उसकी बात सुनी,अधिकारी से पूछा और अर्जी उसके हवाले कर दी। या तो मंत्री ने खुद कह दिया कि अधिकारी से मिल लेना या खुद अधिकारी बोल पड़ा,मुझसे आकर मिल लेना। जो भी लोग आए उनके काम लंबे समय से अटके हैं। किन्तु उनको आज भी यह बताने वाला कोई नहीं था कि उनका काम कब होगा। मंत्री के साथ कलेक्टर,एसपी, विधायक राधेश्याम गंगानगर,संतोष सहारण,कांग्रेस नेता राजकुमार गौड़,कुलदीप इंदौरा,पृथ्वी पाल सिंह सहित अन्य नेता पदाधिकारी भी थे। अधिकांश तो बस उपस्थिति लगाने के लिए ही थे। जिनकी सुनवाई करनी थी वे बाहर थे अपनी बारी के इंतजार में।
अव्यवस्था रही मंत्री की सुनवाई में
श्रीगंगानगर-प्रभारी मंत्री की जन सुनवाई के समय शुरू में तो काफी अव्यवस्था का माहौल रहा। शोर इतना अधिक था कि कौन क्या कह रहा है सुना ही नहीं जा रहा था। बड़ी संख्या में लोग एक साथ अंदर आ गए। पत्रकार भी बहुत अधिक थे। एसपी ने कलेक्टर के इशारे पर पत्रकारों से पूछा भी। एसपी ने पत्रकारों को बाहर ले जाने के प्रयास भी किए। लेकिन पार नहीं पड़ी। कुछ समय बाद बार बारी से एक एक करके बुलाने का सिलसिला शुरू हुआ तब कहीं जाकर कोई व्यवस्था बनी। जो जनप्रतिनिधि देरी से आए उनको उनके अनुकूल स्थान पर बैठने के लिए कई बार कुर्सी खिसकानी पड़ी। जिला प्रमुख के आने पर तो कलेक्टर,एसपी को भी कुर्सी छोडकर उनके लिए कुर्सी लगवानी पड़ी।
शंकर पन्नू पहुंचे किसानों के साथ प्रभारी मंत्री के दरबार में
श्रीगंगानगर- कांग्रेस के इस शासन किसानों की सुनवाई नहीं हो रही। अगर किसानों की सुनवाई होती तो कांग्रेस नेता पूर्व सांसद शंकर पन्नू को खुद गन्ना उत्पादकों का प्रतिनिधिमंडल लेकर सुनवाई के लिए प्रभारी मंत्री के दरबार में नहीं आना पड़ता। वे अन्य कांग्रेस नेताओं की तरह अंदर नहीं बैठे थे। शंकर पन्नू गन्ना उत्पादकों के साथ कलेक्ट्रेट पहुंचे। वे बिना के किसानों के साथ अंदर गए। मंत्री से बात की। उनसे बाहर आकर किसानों से मिलने को कहा। प्रभारी मंत्री सुनवाई बीच में छोडकर बाहर आकर गन्ना उत्पादकों से मिले। गन्ना उत्पादकों ने शुगर मिल की हालत से मंत्री को अवगत करवाया। उनका कहना था कि मिल की हालत खराब है। गन्ना लिया नहीं जा रहा। चूंकि किसान अधिकतर श्रीकरनपुर क्षेत्र के थे इसलिए पृथ्वीपाल संधु भी उनके साथ हो लिए।
काली पट्टी लगा पत्रकार मिले प्रभारी मंत्री से
श्रीगंगानगर-नगर के कुछ पत्रकारों ने काली पट्टी लगाकर प्रभारी मंत्री से बात की। उनका कहना था कि नगर विकास न्यास उनको रियायती दर पर भूखंड नहीं दे रहा जबकि सरकार के आदेश हैं। न्यास अध्यक्ष ज्योति कांडा ने कहा कि वे रिजर्व प्राइज़ पर भूखंड देने को तैयार हैं। इस मसले पर कई पत्रकारों की कांडा जी से बोल चाल भी हुई। कांग्रेस नेताओं ने बीच बचाव किया। न्यास के पूर्व अध्यक्ष राजकुमार गौड़ ने प्रभारी मंत्री को बताया कि इसके लिए पीआरओ की चेयरमेनशिप में कमेटी बनाकर निर्णय लिया जाए। कांडा जी ने भूखंड से वंचित पत्रकारों को बात चीत के लिए बुलाया है।
Sunday 19 February 2012
तंत्र,टोटके,अश्लील वाक्यों की पुस्तक को कलेक्टर ने बताया लाभप्रद
श्रीगंगानगर-टोटकों,तंत्र विद्या का बेशक बहुत महत्व होता होगा। भूत प्रेत के बारे में भी सभी की अपनी अपनी मान्यता होगी। अश्लीलता भी पर्दे में गरिमामय होती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जिला कलेक्टर जाने अनजाने इस प्रकार की बात को बढ़ावा दें और ऐसी बातों को समाज के लिए लाभप्रद बताएं। क्षेत्र में सोने,चांदी,डायमंड के जाने माने व्यवसायी,अनेकानेक सामाजिक धार्मिक संस्थाओं से जुड़े हुए शामलाल जैन ने “अरोग्यता का रहस्य” नामक पुस्तक का लेखन व संकलन किया। कहने को तो इसमें आयुर्वेद से बीमारियों का इलाज की जानकारी है। परंतु इस पुस्तक में टोटकों के रूप में ऐसे ऐसे अश्लील वाक्य हैं कि उनको यहां लिखना भी संभव नहीं।ये टोटके आयुर्वेद से संबन्धित नहीं हो सकते। विज्ञान के इस युग में जब भूत,प्रेत जैसे अंधविश्वासों को दूर करने के प्रयास होते हैं, स्कूल से लेकर कॉलेज तक की शिक्षा में। ऐसे दौर में पुस्तक यह बताती है कि भूत प्रेत की बाधा कैसे बचा जा सकता है। तंत्र की जानकारी भी इस पुस्तक के कई पृष्ठों पर हैं। इस प्रकार की पुस्तक मेलों,बस अड्डे और रेलवे स्टेशन की स्टाल पर बिका करती हैं। किसी गर्ल्स कॉलेज के उत्सव में उसका विमोचन करवा खुले में वितरित करना उचित नहीं कहा जा सकता। मगर शाम लाल जी को कौन रोकता! वे कॉलेज के कोषाध्यक्ष जो हैं। इसलिए ऐसा हुआ। इसी पुस्तक के बारे में जिला कलेक्टर अंबरीष कुमार का संदेश भी है। जिसमें उन्होने कहा है कि यह पुस्तक समाज के लिए लाभप्रद सिद्ध होगी। पाठकों को इस पुस्तक के माध्यम से अपने जीवन में आने वाली परेशानियों से छुटकारा मिलेगा। समाज खुशहाल एवं निरोगी जीवन व्यतीत कर सकेगा.........आदि आदि। शायद जिला कलेक्टर ने पुस्तक की पाण्डुलिपि पढे बिना ही संदेश दे दिया। अगर वे पढ़ते तो उन वाक्यों को जरूर हटवाते जो अश्लील हैं। तंत्र और टोटकों को बढ़ावा देने वाले हैं। अन्यथा संभव है संदेश देने से मना कर देते। इसी प्रकार के संदेश नगर परिषद आयुक्त हितेश कुमार और नगर परिषद सभापति जगदीश जांदू के भी हैं। शामलाल जैन का इतना नाम तो है ही कि कोई उनको संदेश के लिए कोई नाराज क्यों करने लगा। शामलाल जैन का उद्देश्य भी कोई गलत नहीं हो सकता। वे गर्व से कहते हैं कि “जो कुछ लिखा है एकदम सही है....मैं दिखा सकता हूं कौनसी किताब से लिया।“ सही तो होगा....लेकिन उनके जैसे व्यक्ति के लिए ऐसे वाक्यों सार्वजनिक रूप से बांटी जाने वाली पुस्तक में लिखना ठीक है क्या?
Thursday 2 February 2012
शंकर पन्नू ने करवाई कांडा की मुर्दाबाद,हाय-हाय
श्रीगंगानगर-पूर्व सांसद शंकर पन्नू के सच्चे शब्दों ने नगर विकास न्यास अध्यक्ष ज्योति कांडा की मुर्दाबाद...हाय-हाय करवा दी। समारोह का जायका बिगाड़ दिया। गले में पड़े फूलों माला चुभने लगी। करनी मार्ग पर रेल फाटक उदघाटन समारोह था। छोटा सा शामियाना लगाया गया। हीरा लाल इंदौरा,शंकर पन्नू जैसे बड़े कांग्रेस नेता बुलाए गए। पूरी यूआईटी थी। साइड में वे परिवार भी खड़े थे जिनके मकान तोड़े थे। शंकर पन्नू ने बोलना शुरू किया। वे उनको देख कर बोले...कब्जा किया जब पूछा था क्या...तब अंदर कर देते तो.... इसके बाद पन्नू जी ने क्या बोलना था। वे परिवार शोर मचाने लगे जो मकानों की उम्मीद लगाए थे। शोर मचाते हुए मंच के करीब आ गए। पुलिस ने उनको दूर किया। वे जयोति कांडा मुर्दाबाद...हाय हाय करने लगे। हीरा लाल इंदौरा ने मंच से समझाया। ज्योति कांडा ने भाषण दिया। किसने सुनना था। मुर्दाबाद हाय हाय होती रही। कुछ क्षण बाद यूआईटी चली गई। नेता भी रवाना हो लिए। मकान मांगने वालों ने वहाँ लगे होर्डिंग को निशाना बनाया। पहले दोनों होर्डिंग पर ज्योति कांडा की फोटो पर गीली मिट्टी फेंकी। फिर फोटो पर पत्थर मार कर छेद किए। मन नहीं भरा तो होर्डिंग उखाड़ डाले। उनकी चिंदी चिंदी कर जिसके हाथ में जो आया वह उसे लेकर चलता बना। कोई बांस ले गया। किसी के हाथ लोहा आया। कोई फ़्लेक्स समेत कर चलता बना।जितना समय होर्डिंग को बनाने में लगा होगा उससे कम समय में उसको तार-तार करने में लगा। सभी खुश। शंकर पन्नू भी और कांडा जी भी। शंकर पन्नू की बात तो सच्ची थी किन्तु मौका और स्थान सही नहीं था। केवल उदघाटन होता तो मीडिया में उतना प्रचार नहीं होता। जितना अब होगा। इसीलिए तो कहते हैं कि कड़वा सच पत्थर के समान होता है,मगर वह नुकसान पत्थर की चोट से भी अधिक करता है।
